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उद्योग पर्व
अध्याय १२७
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वैशम्पाय़न उवाच
त्वं ह्येवात्र भृशं गर्ह्यो धृतराष्ट्र सुतप्रिय़ः |  ११   क
यो जानन्पापतामस्य तत्प्रज्ञामनुवर्तसे ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति