उद्योग पर्व  अध्याय १२७

वैशम्पाय़न उवाच

स मातुर्वचनाकाङ्क्षी प्रविवेश सभां पुनः |  १७   क
अभिताम्रेक्षणः क्रोधान्निःश्वसन्निव पन्नगः ||  १७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति