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उद्योग पर्व
अध्याय १२७
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वैशम्पाय़न उवाच
न हि राज्यं महाप्राज्ञ स्वेन कामेन शक्यते |  २१   क
अवाप्तुं रक्षितुं वापि भोक्तुं वा भरतर्षभ ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति