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उद्योग पर्व
अध्याय १२७
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वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रिय़ाणि महत्प्रेप्सुर्निय़च्छेदर्थधर्मय़ोः |  २५   क
इन्द्रिय़ैर्निय़तैर्वुद्धिर्वर्धतेऽग्निरिवेन्धनैः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति