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उद्योग पर्व
अध्याय १२७
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वैशम्पाय़न उवाच
आत्मानमेव प्रथमं देशरूपेण यो जय़ेत् |  २८   क
ततोऽमात्यानमित्रांश्च न मोघं विजिगीषते ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति