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द्रोण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
वार्ष्णेय़ीदय़ितं शूरं मय़ा सततलालितम् |  २५   क
अम्वाय़ाश्च प्रिय़ं नित्यं कोऽवधीत्कालचोदितः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति