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उद्योग पर्व
अध्याय १२७
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वैशम्पाय़न उवाच
याभ्यां हि देवाः स्वर्यातुः स्वर्गस्यापिदधुर्मुखम् |  ३१   क
विभ्यतोऽनुपरागस्य कामक्रोधौ स्म वर्धितौ ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति