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उद्योग पर्व
अध्याय १२७
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वैशम्पाय़न उवाच
कामं क्रोधं च लोभं च दम्भं दर्पं च भूमिपः |  ३२   क
सम्यग्विजेतुं यो वेद स महीमभिजाय़ते ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति