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उद्योग पर्व
अध्याय १२७
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वैशम्पाय़न उवाच
श्रीमद्भिरात्मवद्भिर्हि वुद्धिमद्भिर्जितेन्द्रिय़ैः |  ४४   क
पाण्डवैर्विग्रहस्तात भ्रंशय़ेन्महतः सुखात् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति