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उद्योग पर्व
अध्याय १२७
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वैशम्पाय़न उवाच
न चैष शक्तः पार्थानां यस्त्वदर्थमभीप्सति |  ४७   क
सूतपुत्रो दृढक्रोधो भ्राता दुःशासनश्च ते ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति