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उद्योग पर्व
अध्याय १२७
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वैशम्पाय़न उवाच
समं हि राज्यं प्रीतिश्च स्थानं च विजितात्मनाम् |  ५१   क
पाण्डवेष्वथ युष्मासु धर्मस्त्वभ्यधिकस्ततः ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति