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द्रोण पर्व
अध्याय १२७
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सञ्जय़ उवाच
जय़द्रथो जीवितार्थी गच्छमानो गृहान्प्रति |  १०   क
मय़ानार्येण संरुद्धो द्रोणात्प्राप्याभय़ं रणे ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति