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द्रोण पर्व
अध्याय १२७
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कर्ण उवाच
तथा ह्येनमतिक्रम्य प्रविष्टः श्वेतवाहनः |  १३   क
दैवदृष्टोऽन्यथाभावो न मन्ये विद्यते क्वचित् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति