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द्रोण पर्व
अध्याय १२७
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कर्ण उवाच
दैवोपसृष्टः पुरुषो यत्कर्म कुरुते क्वचित् |  १६   क
कृतं कृतं स्म तत्तस्य दैवेन विनिहन्यते ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति