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द्रोण पर्व
अध्याय १२७
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सञ्जय़ उवाच
कथं ह्यनिच्छमानस्य द्रोणस्य युधि फल्गुनः |  ६   क
भिन्द्यात्सुदुर्भिदं व्यूहं यतमानोऽपि संय़ुगे ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति