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द्रोण पर्व
अध्याय १२७
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सञ्जय़ उवाच
प्रिय़ो हि फल्गुनो नित्यमाचार्यस्य महात्मनः |  ७   क
ततोऽस्य दत्तवान्द्वारं नय़ुद्धेनारिमर्दन ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति