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शान्ति पर्व
अध्याय १२८
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भीष्म उवाच
अविज्ञानादय़ोगश्च पुरुषस्योपजाय़ते |  १०   क
अविज्ञानादय़ोगो हि योगो भूतिकरः पुनः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति