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शान्ति पर्व
अध्याय १२८
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भीष्म उवाच
प्राक्कोशः प्रोच्यते धर्मो वुद्धिर्धर्माद्गरीय़सी |  १४   क
धर्मं प्राप्य न्याय़वृत्तिमवलीय़ान्न विन्दति ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति