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शान्ति पर्व
अध्याय १२८
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भीष्म उवाच
द्रुमाः केचन सामन्ता ध्रुवं छिन्दन्ति तानपि |  ४१   क
ते चापि निपतन्तोऽन्यान्निघ्नन्ति च वनस्पतीन् ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति