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शान्ति पर्व
अध्याय १२८
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भीष्म उवाच
अधनं दुर्वलं प्राहुर्धनेन वलवान्भवेत् |  ४९   क
सर्वं धनवतः प्राप्यं सर्वं तरति कोशवान् |  ४९   ख
कोशाद्धर्मश्च कामश्च परो लोकस्तथाप्ययम् ||  ४९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति