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अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
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महेश्वर उवाच
तेन मे सर्ववासानां श्मशाने रमते मनः |  १७   क
न्यग्रोधशाखासञ्छन्ने निर्भुक्तस्रग्विभूषिते ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति