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शान्ति पर्व
अध्याय १३७
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व्रह्मदत्त उवाच
कृतस्य चैव कर्तुश्च सख्यं सन्धीय़ते पुनः |  ३३   क
वैरस्योपशमो दृष्टः पापं नोपाश्नुते पुनः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति