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अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
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महेश्वर उवाच
उपवासः सदा धर्मो व्राह्मणस्य न संशय़ः |  ३१   क
स हि धर्मार्थमुत्पन्नो व्रह्मभूय़ाय़ कल्पते ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति