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अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
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महेश्वर उवाच
गुरुणा त्वभ्यनुज्ञातः समावर्तेत वै द्विजः |  ३७   क
विन्देतानन्तरं भार्यामनुरूपां यथाविधि ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति