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अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
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महेश्वर उवाच
आत्मानमुपजीवन्यो निय़तो निय़ताशनः |  ४७   क
देहं वानशने त्यक्त्वा स स्वर्गं समुपाश्नुते ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति