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अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
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महेश्वर उवाच
भुक्ते परिजने पश्चाद्भोजनं धर्म उच्यते |  ४२   क
व्राह्मणस्य गृहस्थस्य श्रोत्रिय़स्य विशेषतः ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति