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अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
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महेश्वर उवाच
यस्तु क्षत्रगतो देवि त्वय़ा धर्म उदीरितः |  ४६   क
तमहं ते प्रवक्ष्यामि तं मे शृणु समाहिता ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति