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अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
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महेश्वर उवाच
तिलान्गन्धान्रसांश्चैव न विक्रीणीत वै क्वचित् |  ५५   क
वणिक्पथमुपासीनो वैश्यः सत्पथमाश्रितः ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति