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अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
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महेश्वर उवाच
स शूद्रः संशिततपाः सत्यसन्धो जितेन्द्रिय़ः |  ५७   क
शुश्रूषन्नतिथिं प्राप्तं तपः सञ्चिनुते महत् ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति