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अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
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महेश्वर उवाच
इन्द्रेण च पुरा वज्रं क्षिप्तं श्रीकाङ्क्षिणा मम |  ८   क
दग्ध्वा कण्ठं तु तद्यातं तेन श्रीकण्ठता मम ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति