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उद्योग पर्व
अध्याय १२८
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वैशम्पाय़न उवाच
त्वमिमं पुण्डरीकाक्षमप्रधृष्यं दुरासदम् |  ३६   क
पापैः सहाय़ैः संहत्य निग्रहीतुं किलेच्छसि ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति