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वन पर्व
अध्याय ३१
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द्रौपद्यु उवाच
आर्यकर्मणि युञ्जानः पापे वा पुनरीश्वरः |  २९   क
व्याप्य भूतानि चरते न चाय़मिति लक्ष्यते ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति