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द्रोण पर्व
अध्याय १२८
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सञ्जय़ उवाच
शरैर्दश दिशो राजंस्तेषां मुक्तैः सहस्रशः |  १०   क
न भ्राजन्त यथापूर्वं भास्करेऽस्तं गतेऽपि च ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति