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द्रोण पर्व
अध्याय १२८
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सञ्जय़ उवाच
पर्यधावन्त पाञ्चाला वध्यमाना महात्मना |  १७   क
रुक्मपुङ्खैः प्रसन्नाग्रैस्तव पुत्रेण धन्विना |  १७   ख
अर्द्यमानाः शरैस्तूर्णं न्यपतन्पाण्डुसैनिकाः ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति