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द्रोण पर्व
अध्याय १२८
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सञ्जय़ उवाच
पाण्डुसेनां हतां दृष्ट्वा तव पुत्रेण भारत |  २१   क
भीमसेनपुरोगास्तु पाञ्चालाः समुपाद्रवन् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति