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द्रोण पर्व
अध्याय १२८
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सञ्जय़ उवाच
शतशश्चापरान्योधान्सद्विपाश्वरथान्रणे |  २५   क
शरैरवचकर्तोग्रैः क्रुद्धोऽन्तक इव प्रजाः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति