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द्रोण पर्व
अध्याय १२८
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सञ्जय़ उवाच
विव्याध चैनं दशभिः सम्यगस्तैः शितैः शरैः |  २७   क
मर्माणि भित्त्वा ते सर्वे सम्भग्नाः क्षितिमाविशन् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति