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द्रोण पर्व
अध्याय १२८
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सञ्जय़ उवाच
ततः प्रमुदिता योधाः परिवव्रुर्युधिष्ठिरम् |  २८   क
वृत्रहत्यै यथा देवाः परिवव्रुः पुरन्दरम् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति