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द्रोण पर्व
अध्याय १२८
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सञ्जय़ उवाच
ततः पाञ्चालसैन्यानां भृशमासीद्रवो महान् |  ३०   क
हतो राजेति राजेन्द्र मुदितानां समन्ततः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति