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द्रोण पर्व
अध्याय १२८
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सञ्जय़ उवाच
वाणशव्दरवश्चोग्रः शुश्रुवे तत्र मारिष |  ३१   क
अथ द्रोणो द्रुतं तत्र प्रत्यदृश्यत संय़ुगे ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति