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वन पर्व
अध्याय ४३
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अर्जुन उवाच
मातले गच्छ शीघ्रं त्वमारोहस्व रथोत्तमम् |  १५   क
राजसूय़ाश्वमेधानां शतैरपि सुदुर्लभम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति