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द्रोण पर्व
अध्याय १२८
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सञ्जय़ उवाच
रथिनां रथिभिः सार्धं रुधिरस्रावि दारुणम् |  ४   क
प्रावर्तत महद्युद्धं निघ्नतामितरेतरम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति