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द्रोण पर्व
अध्याय १६१
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सञ्जय़ उवाच
ततस्त्वभ्यवसृत्यैव सङ्ग्रामादुत्तरां दिशम् |  २१   क
अतिष्ठदाहवे द्रोणो विधूम इव पावकः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति