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अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
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महेश्वर उवाच
धर्मेणार्थः समाहार्यो धर्मलव्धं त्रिधा धनम् |  १८   क
कर्तव्यं धर्मपरमं मानवेन प्रय़त्नतः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति