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अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
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महेश्वर उवाच
इमे तु लोकधर्मार्थं त्रय़ः सृष्टाः स्वय़म्भुवा |  ४   क
पृथिव्याः सर्जने नित्यं सृष्टास्तानपि मे शृणु ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति