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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
हरिं सहस्रशिरसं सहस्रचरणेक्षणम् |  १४   क
प्राहुर्नाराय़णं देवं यं विश्वस्य पराय़णम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति