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द्रोण पर्व
अध्याय १४६
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सञ्जय़ उवाच
भुजैश्छिन्नैर्महाराज शरीरैश्च सहस्रशः |  ३१   क
समास्तीर्णा धरा तत्र वभौ पुष्पैरिवाचिता ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति