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अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
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महेश्वर उवाच
सर्वेष्वेवर्षिधर्मेषु जेय़ आत्मा जितेन्द्रिय़ः |  ४८   क
कामक्रोधौ ततः पश्चाज्जेतव्याविति मे मतिः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति