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अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
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महेश्वर उवाच
नित्यं यज्ञक्रिय़ा धर्मः पितृदेवार्चने रतिः |  ५०   क
सर्वातिथ्यं च कर्तव्यमन्नेनोञ्छार्जितेन वै ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति