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उद्योग पर्व
अध्याय १०
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शल्य उवाच
ततः सञ्चिन्त्य भगवान्वरदानं महात्मनः |  ३४   क
सन्ध्येय़ं वर्तते रौद्रा न रात्रिर्दिवसं न च |  ३४   ख
वृत्रश्चावश्यवध्योऽय़ं मम सर्वहरो रिपुः ||  ३४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति