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वन पर्व
अध्याय १२९
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लोमश उवाच
यत्र स्नात्वा नरश्रेष्ठ धूतपाप्मा भविष्यति |  २१   क
इह सारस्वतैर्यज्ञैरिष्टवन्तः सुरर्षय़ः |  २१   ख
ऋषय़श्चैव कौन्तेय़ तथा राजर्षय़ोऽपि च ||  २१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति